मूल श्लोक
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
ātmaupamyena sarvatra samaṃ paśyati yo'rjuna sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ sa yogī paramo mataḥ
अनुवाद
हे अर्जुन! सुख हो या दुःख, अपने समान औरों को भी। जो ऐसी (आत्मौपम्य) दृष्टि से सर्वत्र समान देखने लगे, वह (कर्म-) योगी परम अर्थात् उत्कृष्ट माना जाता है।
टिप्पणी
'प्राणिमात्र में एक ही आत्मा है' यह दृष्टि सांख्य और कर्मयोग, दोनों मार्गों में एक-सी है। ऐसे ही पातंजलयोग में भी समाधि लगाकर परमेश्वर की पहचान हो जाने पर यही साम्यावस्था प्राप्त होती है। परन्तु सांख्य और पातंजलयोगी, दोनों को भी सब कर्मों का त्याग इष्ट है, अतएव वे व्यवहार में इस साम्य-बुद्धि के उपयोग करने का मौका ही नहीं आने देते; और गीता का कर्मयोगी ऐसा न कर, अध्यात्मज्ञान से प्राप्त हुई इस साम्यबुद्धि का व्यवहार में भी नित्य उपयोग करके, जगत को सभी काम लोकसंग्रह के लिए किया करता है, यही इन दोनों में बड़ा भारी भेद है, और इसी से इस अध्याय के अन्त में (श्लोक 46) स्पष्ट कहा है, कि तपस्वी अर्थात् पातंजलयोगी और ज्ञानी, अर्थात् सांख्यमार्गी, इन दोनों की अपेक्षा कर्मयोगी श्रेष्ठ है। साम्ययोग के इस वर्णन को सुनकर अब अर्जुन ने शंका की –
— Lokmanya Tilak