मूल श्लोक
अर्जुन उवाच ।योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
arjuna uvāca yo'yaṃ yogastvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana etasyāhaṃ na paśyāmi cañcalatvātsthitiṃ sthirām
अनुवाद
अर्जुन ने कहा: हे मधुसूदन! साम्य अथवा साम्यबुद्धि से प्राप्त होनेवाला जो यह (कर्म-) योग तुमने बतलाया, मैं नहीं देखता, कि (मन की) चंचलता के कारण वह स्थिर रहेगा।