मूल श्लोक
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।सर्वथा वर्त्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ bhajatyekatvamāsthitaḥ sarvathā varttamāno'pi sa yogī mayi vartate
अनुवाद
जो एकत्वबुद्धि अर्थात् सर्वभूतात्मैक्यबुद्धि को मन में रखकर सब प्राणियों में रहने वाले मुझको (परमेश्वर को) भजता है, वह (कर्म-) योगी सब प्रकार से बर्ता हुआ भी मुझमें रहता है।