मूल श्लोक
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yastvindriyāṇi manasā niyamyārabhate'rjuna karmendriyaiḥ karmayogamasaktaḥ sa viśiṣyate
अनुवाद
परन्तु हे अर्जुन! उसकी योग्यता विशेष अर्थात् श्रेष्ठ है कि जो मन से इन्द्रियों का आकलन करके, (केवल) कर्मेन्द्रियों द्वारा अनासक्त बुद्धि से 'कर्मयोग' का आरम्भ करता है।
टिप्पणी
पिछले अध्याय में जो यह बतलाया गया है कि कर्मयोग में कर्म की अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है (गीता 2.49) उसी का इन दोनो श्लोकों में स्पष्टीकरण किया गया है। यहाँ साफ-साफ कह दिया गया है कि जिस मनुष्य का मन तो शुद्ध नहीं है, पर केवल दूसरों के भय से या इस अभिलाषा से कि दूसरे मुझे भला कहें, केवल बाह्येन्द्रियों के व्यापार को रोकता है, वह सच्चा सदाचारी नहीं है, वह ढोंगी है। जो लोग इस वचन का प्रमाण देकर, कि 'कलौ कर्ता च लिप्यते' – कलियुग में दोष बुद्धि में नहीं, किन्तु कर्म में रहता है – यह प्रतिपादन किया करते है कि बुद्धि चाहे जैसी हो, परन्तु कर्म बुरा न हो; उन्हें इस श्लोक में वर्णित गीता के तत्त्व पर विशेष ध्यान देना चाहिए। सातवें श्लोक से यह बात प्रगट होती है कि निष्काम बुद्धि से कर्म करने के योग को ही गीता में 'कर्मयोग' कहा है। संन्यासमार्गीय कुछ टीकाकार इस श्लोक का ऐसा अर्थ करते है कि यद्यपि यह कर्मयोग छठे श्लोक में बतलाए हुए दाम्भिक मार्ग से श्रेष्ठ है, तथापि यह संन्यासमार्ग से श्रेष्ठ नहीं है। परन्तु यह युक्ति साम्प्रदायिक आग्रह की है, क्योंकि न केवल इसी श्लोक में, वरन् फिर पाँचवें अध्याय के आरम्भ में और अन्यत्र भी, यह स्पष्ट कर दिया गया है कि संन्यासमार्ग से कर्मयोग अधिक योग्यता का या श्रेष्ठ (गीतार॰ पृ. 307 – 308)। इस प्रकार जब कर्मयोग ही श्रेष्ठ है, तब अर्जुन को इसी मार्ग का आचरण करने लिए उपदेश करते है--
— Lokmanya Tilak