मूल श्लोक
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
karmendriyāṇi saṃyamya ya āste manasā smaran indriyārthānvimūḍhātmā mithyācāraḥ sa ucyate
अनुवाद
जो मूढ (हाथ पैर आदि) कर्मेन्द्रियों को रोककर मन से इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन किया करता है, उसे मिथ्याचारी अर्थात् दाम्भिक कहते है।