मूल श्लोक
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
indriyasyendriyasyārthe rāgadveṣau vyavasthitau tayorna vaśamāgacchettau hyasya paripanthinau
अनुवाद
इन्द्रिय और उसके (शब्द-स्पर्श आदि) विषयों में प्रीति एवं द्वेष (दोनों) व्यवस्थित हैं, अर्थात् स्वभावतः निश्चित हैं। प्रीति और द्वेष के वश में न जाना चाहिए (क्योंकि ) ये मनुष्य के शत्रु है।
टिप्पणी
तैंतीसवें श्लोक के 'निग्रह' शब्द का अर्थ 'निरा-संयमन' ही नहीं है, किन्तु उसका अर्थ 'जबरदस्ती' अथवा 'हठ' है। इन्द्रियों का योग्य संयमन तो गीता को इष्ट है, किन्तु यहाँ पर कहना यह है कि हठ से या जबरदस्ती से इन्द्रियों की स्वाभाविक वृत्ति को ही एकदम मार डालना सम्भव नहीं है। उदाहरण लीजिए, जब तक देह तब तक भूख-प्यास आदि धर्म, प्रकृतिसिद्ध होने के कारण, छूट नहीं सकते; मनुष्य कितना ही ज्ञानी क्यों न हो, भूख लगते ही भिक्षा माँगने के लिए उसे बाहर निकलना पड़ता है, इसलिए चतुर पुरुषों का यही कर्तव्य है कि जबरदस्ती से इन्द्रियों को बिलकुल ही मार डालने का वृथा हठ न करें; और योग्य संयम के द्वारा उन्हें अपने वश में करके, उनकी स्वभावसिद्ध वृत्तियों का लोकसंग्रहार्थ उपयोग किया करें। इसी प्रकार 34 वें श्लोक के 'व्यवस्थित' पद से प्रगट होता है, कि सुख और दुःख दोनों विकार स्वतन्त्र है; एक दूसरे का अभाव नहीं है (देखो गीतार॰ प्र॰ 4 पृ.99 और 113)। प्रकृति अर्थात् सृष्टि के अखंडित व्यापार में कई बार हमें ऐसी बातें भी करनी पड़ती है, कि जो हमें स्वयं पसन्द नहीं (देखो गी॰ 18.59); और यदि नहीं करते हैं, तो निर्वाह नहीं होता। ऐसे समय ज्ञानी पुरुष इन कर्मों को निरिच्छ बुद्धि से केवल कर्तव्य समझकर करता जाता है, अतः पाप-पुण्य से अलिप्त रहता है; और अज्ञानी उसी में आसक्ति रखकर दुःख पाता है। भास कवि के वर्णनानुसार बुद्धि की दृष्टि से यही इन दोनों में बड़ा भारी भेद है। परन्तु अब एक और शंका होती है, कि यद्यपि यह सिद्ध हो गया, कि इन्द्रियों को जबरदस्ती मार कर कर्मत्याग न करें, किन्तु निःसंग बुद्धि से सभी काम करता जावें; परन्तु यदि ज्ञानी पुरुष युद्ध के समान हिंसात्मक घोर कर्म करने की अपेक्षा खेती, व्यापार या भिक्षा माँगना आदि कोई निरुपद्रवी और सौम्य कर्म करें तो क्या अधिक प्रशस्त नहीं है? भगवान इसका यह उत्तर देते है –
— Lokmanya Tilak