भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.५० ·

English

मूल श्लोक

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

buddhiyukto jahātīha ubhe sukṛtaduṣkṛte tasmādyogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam

२.५०अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ५०

अनुवाद

जो (साम्य-) बुद्धि से युक्त हो जाएँ, वह इस लोग में पाप और पुण्य दोनों से अलिप्त रहता है, अतएव योग का आश्रय कर (पाप-पुण्य से बच) कर्म करने की चतुराई (कुशलता या युक्ति ) को ही (कर्मयोग) कहते है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इन श्लोकों में कर्मयोग का जो लक्षण बतलाया है, वह महत्त्व का है; इस सम्बन्ध में गीतारहस्य के तीसरे प्रकरण ( पृ. 55 – 63) में जो विवेचन किया गया है, उसे देखो। इसमें भी कर्मयोग का जो तत्त्व - 'कर्म की अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है' – 49 वें श्लोक में बतलाया है वह अत्यन्त महत्त्व का है। 'बुद्धि' शब्द के पीछे 'व्यवसायात्मिका' विशेषण नहीं है इसलिए इस श्लोक में उसका अर्थ 'वासना' या 'समझ' होना चाहिए। कुछ लोग बुद्धि का 'ज्ञान' अर्थ करके इस श्लोक का ऐसा अर्थ किया चाहते है कि ज्ञान की अपेक्षा कर्म हलके दर्जे का है; परन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है। क्योंकि पीछे 48 वें श्लोक में समत्व का लक्षण बतलाया है और 49 वें तथा अगले श्लोक में भी वही वर्णित है। इस कारण यहाँ बुद्धि का अर्थ समत्वबुद्धि ही करना चाहिए। किसी भी कर्म की भलाई-बुराई कर्म पर अवलम्बित नहीं होती; कर्म एक ही क्यों न हो, पर करनेवाले की भली या बुरी बुद्धि के अनुसार वह शुभ अथवा अशुभ हुआ करता है; अतः कर्म की अपेक्षा बुद्धि ही श्रेष्ठ है; इत्यादि नीति के तत्त्वों का विचार गीतारहस्य के चौथे, बारहवें और पन्द्रहवें प्रकरण में ( पृ. 87, 380 – 381 और 473 – 478) किया गया है; इस कारण यहाँ और अधिक चर्चा नहीं करते। 41 वे श्लोक में बतलाया ही है कि वासनात्मक बुद्धि को सम और शुद्ध रखने के लिए कार्य-अकार्य का निर्णय करने वाली व्यवसायात्मक बुद्धि पहले ही स्थिर हो जानी चाहिए। इसलिए 'साम्यबुद्धि' इस शब्द से ही स्थिर व्यवसायात्मक बुद्धि और शुद्ध वासना (वासनात्मक बुद्धि) इन दोनों का बोध हो जाता है। यह साम्यबुद्धि ही शुद्ध आचरण अथवा कर्मयोग की जड़ है, इसलिए 36 वें श्लोक में भगवान ने पहले जो यह कहा है कि कर्म करके भी कर्म की बाधा न लगने वाली युक्ति अथवा योग तुझे बतलाता हूँ, उसी के अनुसार इस श्लोक में कहा है कि 'कर्म करते समय बुद्धि को स्थिर, पवित्र, सम और शुद्ध रखना ही' वह 'युक्ति ' या कौशल्य है और इसी को 'योग' कहते है – इस प्रकार योग शब्द की दो बार व्याख्या की गई है। 50 वें श्लोक के 'योगः कर्मसु कौशलम्' इस पद का इस प्रकार सरल अर्थ लगने पर भी, कुछ लोगों ने ऐसी खींचातानी से अर्थ लगाने का प्रयत्न किया है, कि 'कर्मसु योगः कौशलम्' कर्म में जो योग है, उसको कौशल कहते है। पर 'कौशल' शब्द की व्याख्या करने का यहाँ कोई प्रयोजन नहीं है, 'योग' शब्द का लक्षण बतलाना ही अभीष्ट है, इसलिए यह अर्थ सच्चा नहीं माना जा सकता। इसके अतिरिक्त जब कि 'कर्मसु कौशलम्' ऐसा सरल अन्वय लग सकता है, तब 'कर्मसु योगः' ऐसा औंधा-सीधा अन्वय करना ठीक भी नहीं है। अब बतलाते है कि इस प्रकार साम्य बुद्धि में समस्त कर्म करते रहने से व्यवहार का लोप नहीं होता और पूर्ण सिद्धि अथवा मोक्ष प्राप्त हुए बिना नहीं रहता –

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.५०