मूल श्लोक
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
dūreṇa hyavaraṃ karma buddhiyogāddhanañjaya buddhau śaraṇamanviccha kṛpaṇāḥ phalahetavaḥ
अनुवाद
क्योंकि हे धनंजय! बुद्धि के (साम्य) योग की अपेक्षा (बाह्य) कर्म बहुत ही कनिष्ट है अतएव इस (साम्य-) बुद्धि की शरण में जा। फलहेतुक अर्थात् फल पर दृष्टि रखकर काम करनेवाला लोग कृपण अर्थात् दीन या निचले दर्जे के है।