मूल श्लोक
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
duḥkhamityeva yatkarma kāyakleśabhayāttyajet sa kṛtvā rājasaṃ tyāgaṃ naiva tyāgaphalaṃ labhet
अनुवाद
शरीर को कष्ट होने के डर से अर्थात् दुःखकारक होने के कारण ही यदि कोई कर्म छोड़ दें तो उसका वह त्याग राजस हो जाता है (तथा) त्याग का फल उसे नहीं मिलता।