भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.९ ·

English

मूल श्लोक

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

kāryamityeva yatkarma niyataṃ kriyate'rjuna saṅgaṃ tyaktvā phalaṃ caiva sa tyāgaḥ sāttviko mataḥ

१८.९अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक ९

अनुवाद

हे अर्जुन! (स्वधर्मानुसार) नियत कर्म जब कार्य अथवा कर्तृत्व समझकर और आसक्ति एवं फल को छोड़कर किया जाता है, तब वह सात्त्विक त्याग समझा जाता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

सातवें श्लोक के 'नियत' शब्द का अर्थ कुछ लोग नित्य-नैमित्तिक आदि भेदों में से 'नित्य' कर्म समझते है; किन्तु वह ठीक नहीं है। 'नियतं कुरु कर्म त्वं' (गी॰ 3.8) पद में 'नियत' शब्द का जो अर्थ है वही अर्थ यहाँ पर भी करना चाहिए। हम ऊपर कह चुके है कि यहाँ मीमांसकों की परिभाषा विवक्षित नहीं है। गी॰ 3.19 में, 'नियत' शब्द के स्थान में 'कार्य' शब्द आया है और यहाँ 9 वें श्लोक में 'कार्य' एवं 'नियत' दोनों शब्द एकत्र आ गए हैं। इस अध्याय में दूसरे श्लोक में यह कहा गया है, कि स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले किसी भी कर्म को न छोड़कर उसी को कर्तव्य समझकर करते रहना चाहिए (देखो गी॰ 3.19), इसी को सात्त्विक त्याग कहते है; और कर्मयोग-शास्त्र में इसी को 'त्याग' अथवा 'संन्यास' कहते है। इसी सिद्धान्त के अर्थों का स्पष्टीकरण हो चुका। अब इसी तत्त्व के अनुसार बतलाते हैं, कि वास्तविक त्यागी और संन्यासी कौन है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.९