भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १४.२५ ·

English

मूल श्लोक

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।सर्वारंभपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

mānāpamānayostulyastulyo mitrāripakṣayoḥ sarvāraṃbhaparityāgī guṇātītaḥ sa ucyate

१४.२५अध्याय १४ · गुणत्रयविभागयोग२७ में से श्लोक २५

अनुवाद

जिसे मान-अपमान या मित्र और शत्रु-दल तुल्य है अर्थात् एक से हैं; और (इस समझ से कि प्रकृति सब कुछ करती है) जिसके सब (काम्य) उद्योग छूट गए है – उस पुरुष को गुणातीत कहते है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

यह इन दो प्रश्नों का उत्तर हुआ, कि त्रिगुणातीत पुरुष के लक्षण क्या है, और आचार कैसा होता है। ये लक्षण, और दूसरे अध्याय में बतलाए हुए स्थितप्रज्ञ के लक्षण (2.55 – 72), एवं बारहवें अध्याय (12.13 – 20) में बतलाए हुए भक्ति मान् पुरुष के लक्षण सब एक से ही है। अधिक क्या कहें, 'सर्वारम्भपरित्यागी,' 'तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः' और 'उदासीनः' प्रभृति कुछ विशेषण भी दोनों या तीनों स्थानों पर एक ही हैं। इससे प्रगट होता है, कि पिछले अध्याय में बतलाए हुए (13.24, 25) चार मार्गों में से किसी भी मार्ग के स्वीकार कर लेने पर सिद्धि-प्राप्त पुरुष का आचरण, और उसके लक्षण सब मार्गों में एक ही से रहते हैं। तथापि तीसरे, चौथे और पाँचवें अध्यायों में जब यह दृढ़ और अटल सिद्धान्त किया है, कि निष्काम कर्म किसी से भी नहीं छूट सकते, तब स्मरण रखना चाहिए कि ये स्थितप्रज्ञ, भगवद्भक्त या त्रिगुणातीत सभी कर्मयोग-मार्ग के है। 'सर्वारम्भपरित्यागी' का अर्थ 12 वें अध्याय के 19 वें श्लोक की टिप्पणी में बतला आए है सिद्धावस्था में पहुँचे हुए पुरुषों के इन वर्णनों को स्वतन्त्र मान कर संन्यासमार्ग के टीकाकार अपने ही सम्प्रदाय को गीता में प्रतिपाद्य बतलाते हैं। परन्तु यह अर्थ पूर्वापार सन्दर्भ के विरुद्ध है, अतएव ठीक नहीं है। गीतारहस्य के 11 वें और 12 वें प्रकरण में (पृ.324 – 325 और 373) इस बात का हमने विस्तारपूर्वक प्रतिपादन कर दिया है। अर्जुन के दोनों प्रश्नों के उत्तर हो चुके। अब यह बतलाते है, कि ये पुरुष इन तीन गुणों से परे कैसे जाते हैं–

— Lokmanya Tilak

अध्याय १४, श्लोक १४.२५