भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १३.२४ ·

English

मूल श्लोक

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

ya evaṃ vetti puruṣaṃ prakṛtiṃ ca guṇaiḥ saha sarvathā vartamāno'pi na sa bhūyo'bhijāyate

१३.२४अध्याय १३ · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग३५ में से श्लोक २४

अनुवाद

इस प्रकार पुरुष (निर्गुण) और प्रकृति को ही जो गुणों समेत जानता है, वह कैसा ही बर्ताव क्यों न किया करें उसका पुनर्जन्म नहीं होता।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

22 वें श्लोक में जब यह निश्चय हो चुका, कि पुरुष ही देह में परमात्मा है, तब सांख्यशास्त्र के अनुसार पुरुष को जो उदासीनत्व और अकर्तृत्व है वही आत्मा का अकर्तृत्व हो जाता है और इस प्रकार सांख्यों की उपपत्ति से वेदान्त की एकवाक्यता हो जाती है। कुछ वेदान्त वाले ग्रन्थकारों की समझ है, कि सांख्यवादी वेदान्त के शत्रु हैं, अतः बहुतेरे वेदान्ती सांख्य-उपपत्ति को सर्वथा त्याज्य मानते हैं। किन्तु गीता ने ऐसा नहीं किया; एक ही विषय क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार का एक बार वेदान्त की दृष्टि से; और दूसरी बार (वेदान्त के अद्वैत मत को बिना छोड़े ही) सांख्य-दृष्टि से, प्रतिपादन किया है। इससे गीताशास्त्र की समबुद्धि प्रगट हो जाती है। यह भी कह सकते है, कि उपनिषदों के और गीता के विवेचन में यह एक महत्त्व का भेद है (देखो गीतार॰ परिशिष्ट पृ. 527)। इससे प्रगट होता है, कि यद्यपि सांख्यों का द्वैत-वाद गीता को मान्य नहीं है, तथापि उनके प्रतिपादन में जो कुछ युक्तिसंगत जान पड़ता है, वह गीता को अमान्य नहीं है। दूसरे ही श्लोक में कह दिया है, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का ज्ञान ही परमेश्वर का ज्ञान है। अब प्रसंग के अनुसार संक्षेप से पिंड का ज्ञान और देह के परमेश्वर का ज्ञान सम्पादन कर मोक्ष प्राप्त करने के मार्ग बतलाते है–

— Lokmanya Tilak

अध्याय १३, श्लोक १३.२४