मूल श्लोक
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sarvabhūtāni kaunteya prakṛtiṃ yānti māmikām kalpakṣaye punastāni kalpādau visṛjāmyaham
अनुवाद
हे कौन्तेय! कल्प के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति में आ मिलते है और कल्प के आरम्भ में (ब्रह्म के दिन के आरम्भ में) उनको मैं ही फिर निर्माण करता हूँ।