मूल श्लोक
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
prakṛtiṃ svāmavaṣṭabhya visṛjāmi punaḥ punaḥ bhūtagrāmamimaṃ kṛtsnamavaśaṃ prakṛtervaśāt
अनुवाद
मैं अपनी प्रकृति को हाथ में ले कर, (अपने-अपने कर्मों से बँधे हुए) भूतों के इस समूचे समुदाय को पुनः पुनः निर्माण करता हूँ, कि जो (उस) प्रकृति के काबू में रहने से अवश अर्थात् परतन्त्र हैं।