मूल श्लोक
यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yathā''kāśasthito nityaṃ vāyuḥ sarvatrago mahān tathā sarvāṇi bhūtāni matsthānītyupadhāraya
अनुवाद
सर्वत्र बहने वाली महान वायु जिस प्रकार सर्वदा आकाश में रहती है, उसी प्रकार सब भूतों को मुझ में समझ।
टिप्पणी
यह विरोधाभास इसलिए होता है, कि परमेश्वर निर्गुण भी है और सगुण भी है (सातवें अध्याय के 12 वें श्लोक की टिप्पणी, और गीतारहस्य पृ. 205, 208 और 209 देखो)। इस प्रकार अपने स्वरूप का आश्चर्यकारक वर्णन करके अर्जुन की जिज्ञासा को जागृत कर चुकने पर अब भगवान फिर कुछ फेरफार से वही वर्णन प्रसंगानुसार करते है, कि जो सातवें और आठवें अध्याय में पहले किया जा चुका है – अर्थात् हम से व्यक्त सृष्टि किस प्रकार होती है और हमारे व्यक्त रूप कौन से है (गी॰ 6.4 – 18; 17 – 20)। 'योग' शब्द का अर्थ यद्यपि अलौकि क सामर्थ्य या युक्ति किया जाएँ, तथापि स्मरण रहे कि अव्यक्त से व्यक्त होने के इस योग अथवा युक्ति को ही माया कहते है। इस विषय का प्रतिपादन गीता 7.25 की टिप्पणी में और रहस्य के नववें प्रकरण (236 – 240) में हो चुका है। परमेश्वर को यह 'योग' अत्यन्त सुलभ है; किं बहुना यह परमेश्वर का दास ही है, इसलिए परमेश्वर को योगेश्वर (गी॰ 18.75) कहते है। अब बतलाते है, कि इस योग-सामर्थ्य से जगत की उत्पत्ति और नाश कैसे हुआ करते है –
— Lokmanya Tilak