मूल श्लोक
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
kiṃ punarbrāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣayastathā anityamasukhaṃ lokamimaṃ prāpya bhajasva mām
अनुवाद
फिर पुण्यवान ब्राह्मणों की, मेरे भक्तों की और राजर्षियों, क्षत्रियों की बात क्या कहनी है? तू इस अनित्य और असुख अर्थात् दुःखकारक मृत्युलोक में है, इस कारण मेरा भजन कर।
टिप्पणी
32 वें श्लोक के 'पापयोनि' शब्द को स्वतन्त्र न मान कर कुछ टीकाकार कहते है कि वह स्त्रियों, वैश्यों और शूद्रों को भी लागू है, क्योंकि पहले कुछ न पाप किए बिना कोई भी स्त्री, वैश्य या शूद्र का जन्म नहीं पाता। उनके मत में पापयोनि शब्द साधारण है और उसके भेद बतलाने के लिए स्त्री, वैश्य तथा शूद्र उदाहरणार्थ दिए गए है। परन्तु हमारी राय में यह अर्थ ठीक नहीं है। पापयोनि शब्द से वह जाति विवक्षित है, जिसे कि आजकल राज-दरबार में 'जरायम-पैशा कौम' कहते है; इस श्लोक का सिद्धान्त यह है, कि इस जाति के लोगों को भी भगवद्भक्ति से सिद्धि मिलती है। स्त्री, वैश्य और शूद्र कुछ इस वर्ग के नहीं है; उन्हें मोक्ष मिलने में इतनी बाधा है, कि वे वेद सुनने के अधिकारी नहीं है। इसी से भागवतपुराण में कहा है कि – स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा। कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह। इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम्॥ 'स्त्रियों, शूद्रों अथवा कलियुग के नामधारी ब्राह्मणों के कानों में वेद नहीं पहुँचता, इस कारण उन्हें मूर्खता से बचाने के लिए व्यास मुनि के कृपालु होकर उनके कल्याणार्थ महाभारत की – अर्थात् गीता की भी – रचना की' (भाग॰ 4.25)। भगवद्गीता के श्लोक कुछ पाठभेद से अनुगीता में भी पाए जाते है (मभा॰ अश्व॰ 19.61.61)। जाति का, वर्ण का, स्त्री-पुरुष आदि का, अथवा काले-गोरे रंग प्रभृति का कोई भी भेद न रख कर सब को एक ही से सद्गति देनेवाले भगवद्भक्ति के इस राजमार्ग का ठीक बड़प्पन इस देश की और विशेषतः महाराष्ट्र की सन्तमण्डली के इतिहास से किसी को भी ज्ञात हो सकेगा। उल्लिखित श्लोक का अधिक खुलासा गीतारहस्य के पृ. 437 – 440 में देखो। उस प्रकार के धर्म का आचरण करने के विषय में 33 वें श्लोक के उत्तरार्ध में अर्जुन को जो उपदेश किया गया है, अगले श्लोक में ही वही चल रहा है।
— Lokmanya Tilak