भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ९.३ ·

English

मूल श्लोक

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

aśraddadhānāḥ puruṣā dharmasyāsya parantapa aprāpya māṃ nivartante mṛtyusaṃsāravartmani

९.३अध्याय ९ · राजविद्याराजगुह्ययोग३४ में से श्लोक ३

अनुवाद

हे परन्तप! इस पर श्रद्धा न रखने वाले पुरुष मुझे नहीं पाते; वे मृत्युयुक्त संसार के मार्ग में लौट आते हैं, (अर्थात् उन्हें मोक्ष नहीं मिलता)।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

गीतारहस्य के तेरहवें प्रकरण (पृ. 411 – 416) में दूसरे श्लोक के 'राजविद्या,' 'राजगुह्य' और 'प्रत्यक्षावगम' पदों के अर्थों का विचार किया गया है। ईश्वर-प्राप्ति के साधनों को उपनिषदों में 'विद्या' कहा गया है, और यह विद्या गुप्त रखी जाती थी। कहा है, कि भक्ति -मार्ग अथवा व्यक्त की उपासनारूपी विद्या सब गुह्य विद्याओं में श्रेष्ठ अथवा राजा है; इसके अतिरिक्त यह धर्म आँखों से प्रत्यक्ष देख पड़ने वाला और इसी से आचरण करने में सुलभ है। तथापि इक्ष्वाकु प्रभृति राजाओं की परम्परा से ही इस योग का प्रचार हुआ है, (गी॰ 4.2), इसलिए इस मार्ग को राजाओं अर्थात् बड़े आदमियों की विद्या – राजविद्या – कह सकेंगे। कोई भी अर्थ क्यों न लीजिए, प्रगट है कि अक्षर या अव्यक्त ब्रह्म के ज्ञान को लक्ष्य करके यह वर्णन नहीं किया गया है, किन्तु राजविद्या शब्द से यहाँ भक्तिमार्ग ही विवक्षित है, इस प्रकार आरम्भ में ही इस मार्ग की प्रशंसा कर भगवान् अब विस्तार से उसका वर्णन करते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ९, श्लोक ९.३