मूल श्लोक
यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन्यान्ति पितृव्रताः ।भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yānti devavratā devān pitṝnyānti pitṛvratāḥ bhūtāni yānti bhūtejyā yānti madyājino'pi mām
अनुवाद
देवताओं का व्रत करनेवाले देवताओं के पास, पितरों का व्रत करनेवाले पितरों के पास, (भिन्न-भिन्न) भूतों को पूजने वाले (उन) भूतों के पास जाते है, और मेरा यजन करनेवाले मेरे पास आते है।
टिप्पणी
सारांश, यद्यपि एक ही परमेश्वर सर्वत्र समाया हुआ है, तथापि उपासना का फल प्रत्येक के भाव के अनुरूप न्यून-अधिक योग्यता का मिला करता है फिर भी इस पूर्व कथन को भूल न जाना चाहिए, कि यह फल-दान का कार्य देवता नहीं करते – परमेश्वर ही करता है (गी॰7.20 – 23)। ऊपर 24 वें श्लोक भगवान ने जो यह कहा है कि 'सब यज्ञों का भोक्ता मैं ही हूँ' उसका तात्पर्य यही है। महाभारत में भी कहा है – यस्मि न् यंस्मिश्च विषये यो यो याति विनिश्चयम्। स तमेवाभिजानाति नान्यं भरतसत्तम॥ 'जो पुरुष जिस भाव में निश्चय रखता है, वह उस भाव के अनुरूप ही फल पाता है' (शां॰ 352.3), और श्रुति भी है 'यं यथा यथोपासते तदेव भवति' (गी॰8.6) की टिप्पणी देखो)। अनेक देवताओं की उपासना करनेवाले को (नानात्व से), जो फल मिलता है उसे पहले चरण में बतला कर दूसरे चरण में यह अर्थ वर्णन किया है, कि अनन्य भाव से भगवान की भक्ति करनेवालों को ही सच्ची भगवत्प्राप्ति होती है। अब भक्तिमार्ग के महत्त्व का यह तत्त्व बतलाते हैं, कि भगवान इस ओर न देख कर कि हमारा भक्त हमें क्या समर्पण करता है, केवल उसके भाव की ही ओर दृष्टि दे करके उसकी भक्ति को स्वीकार करते है –
— Lokmanya Tilak