मूल श्लोक
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
ahaṃ hi sarvayajñānāṃ bhoktā ca prabhureva ca na tu māmabhijānanti tattvenātaścyavanti te
अनुवाद
क्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ। किन्तु वे तत्त्वतः मुझे नहीं जानते, इसलिए वे लोग गिर जाया करते है।
टिप्पणी
गीतारहस्य के तेरहवें प्रकरण (पृ. 419 – 423) में यह विवेचन है, कि इन दोनों श्लोक के सिद्धान्त का महत्त्व क्या है। वैदिक धर्म में यह तत्त्व बहुत पुराने समय से चला आ रहा है, कि कोई भी देवता हो, वह भगवान का ही एक स्वरूप है। उदाहरणार्थ, ऋग्वेद में ही कहा है कि 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः' (ऋ॰ 1.164.46) – परमेश्वर एक है, परन्तु पण्डित लोग उसी को अग्नि , यम, मातरिश्वा श(वायु) कहा कहते है, और इसी के अनुसार आगे के अध्याय में परमेश्वर के एक होने पर भी उसकी अनेक विभूतियों का वर्णन किया गया है। इसी प्रकार महाभारत के अन्तर्गत नारायणीयोपाख्यान में, चार प्रकार के भक्तों में कर्म करनेवाले एकान्तिक भक्त को श्रेष्ठ (गी॰ 7.19) की टिप्पणी देखो) बतला कर कहा है – ब्रह्माणं शितिकण्ठं च याश्चान्या देवताः स्मृताः। प्रबुद्धचर्या सेवन्तो मामेवैष्यन्ति यत्परम्॥ 'ब्रह्मा को, शिव को, अथवा और दूसरे देवताओं को भजने वाले साधु पुरुष भी मुझमें ही आ मिलते है' (मभा॰ शां॰ 341.35), और गीता के उक्त श्लोक का अनुवाद भागवतपुराण में भी किया गया है (देखो. भाग॰ 10 पू. 40.8 – 10)। इसी प्रकार नारायणीयोपाख्यान में फिर भी कहा है – ये यजन्ति पितृन् गुरूंश्चैवातिथींस्तथा गाश्चैव द्विजमुख्यांश्च पृथिवीं मातरं तथा। कर्मणा मनसा वाचा विष्णुमेव यजन्ति ते। 'देव, पितर, गुरु, अतिथि, ब्राह्मण और गौ प्रभृति की सेवा करनेवाले पर्याय से विष्णु का ही यजन करते है' (मभा॰ शा, 245.26 – 27)। इस प्रकार भागवतधर्म के स्पष्ट कहने पर भी, कि भक्ति को मुख्य मानो, देवतारूप प्रतीक गौण है, यद्यपि विधिभेद हो तथापि उपासना तो एक ही परमेश्वर की होती है, यह बड़े आश्चर्य की बात है, कि भागवतधर्म वाले शैवों से झगड़े किया करते हैं! यद्यपि यह सत्य है, कि किसी भी देवता की उपासना क्यों न करें, पर वह पहुँचती भगवान् को ही है; तथापि यह ज्ञान न होने पर, कि सभी देवता एक हैं, मोक्ष की राह छूट जाती है और भिन्न-भिन्न देवताओं के उपासकों को, उनकी भावना के अनुसार भगवान ही भिन्न-भिन्न फल देते है–
— Lokmanya Tilak