भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ९.२१ ·

English

मूल श्लोक

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालम्क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्नाःगतागतं कामकामा लभन्ते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

te taṃ bhuktvā svargalokaṃ viśālam kṣīṇe puṇye martyalokaṃ viśanti evaṃ trayīdharmamanuprapannāḥ gatāgataṃ kāmakāmā labhante

९.२१अध्याय ९ · राजविद्याराजगुह्ययोग३४ में से श्लोक २१

अनुवाद

और उस विशाल स्वर्गलोक का उपभोग करके, पुण्य का क्षय हो जाने पर वे (फिर जन्म लेकर) मृत्युलोक में आते है। इस प्रकार त्रयीधर्म अर्थात् तीनों वेदों के यज्ञ-याग आदि श्रौत धर्म के पालने वाले और काम्य उपभोग की इच्छा करनेवाले लोगों को (स्वर्ग का) आवागमन प्राप्त होता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

यह सिद्धान्त पहले कई बार आ चुका है, कि यज्ञ-याग आदि धर्म या नाना प्रकार के देवताओं की आराधना से कुछ समय तक स्वर्गवास मिल जाएँ, तो भी पुण्यांश चुक जाने पर उन्हें फिर जन्म ले करके भूलोक में आना पड़ता है (गी॰ 2.42 – 44; 4.34, 6.31. 7.23, 8.16 और 25)। परन्तु मोक्ष में यह झंझट नहीं है, वह नित्य है, अर्थात् एक बार परमेश्वर को पा लेने पर फिर जन्म-मरण के चक्कर में नहीं आना पड़ता। महाभारत (वन॰ 260) में स्वर्ग सुख का जो वर्णन है, वह भी ऐसा ही है। परन्तु यज्ञ-याग आदि से पर्जन्य प्रभृति की उत्पत्ति होती है, अतएव शंका होती है, कि इनको छोड़ देने से इस जगत का योग-क्षेम अर्थात् निर्वाह कैसे होगा (देखो गी॰ 2.45 की टिप्पणी और गीतार॰ पृ. 292)। इसलिए अब ऊपर के श्लोकों से मिलाकर ही इनका उत्तर देते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ९, श्लोक ९.२१