मूल श्लोक
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
tapāmyahamahaṃ varṣaṃ nigṛhṇāmyutsṛjāmi ca amṛtaṃ caiva mṛtyuśca sadasaccāhamarjuna
अनुवाद
हे अर्जुन! मैं उष्णता देता हूँ, मैं पानी को रोकता और बरसाता हूँ; अमृत और मृत्यु, सत् और असत् भी मैं हूँ।
टिप्पणी
परमेश्वर के स्वरूप का ऐसा ही वर्णन फिर विस्तारसहित 10.11 और 12 अध्यायों में हैं। तथापि यहाँ केवल विभूति न बतला कर यह विशेषता दिखलाई है, कि परमेश्वर का और जगत के भूतों का सम्बन्ध माँ-बाप और मित्र इत्यादि के समान है: इन दो स्थानों के वर्णनों में यही भेद है। ध्यान रहे, कि पानी को बरसाने और रोकने में एक क्रिया चाहे हमारी दृष्टि से फायदे की और दूसरी नुकसान की हो, तथापि तात्त्विक दृष्टि से दोनों को परमेश्वर ही करता है, इसी अभिप्राय को मन में रख कर पहले (गी॰ 7.12) में भगवान ने कहा है कि सात्त्विक, राजस और तामस सब पदार्थ मैं ही उत्पन्न करता हूँ; और आगे चौदहवें अध्याय में विस्तारसहित वर्णन किया है, कि गुणणत्रय-विभाग से सृष्टि में नानात्व उत्पन्न होता है। इस दृष्टि से 21 वें श्लोक के सत् और असत् पदों का क्रम में 'भला' और 'बुरा' यह अर्थ किया जा सकेगा, और आगे गीता (17.26 – 28) में एक बार ऐसा अर्थ किया गया है। परन्तु जान पड़ता है कि इन शब्दों के सत् = अविनाशी और असत् = विनाशी या नाशवान ये जो सामान्य अर्थ है (गी॰ 2.16), वे ही इस स्थान पर अभीष्ट होंगे; और 'मृत्यु और अमृत' के समान 'सत् और असत्' द्वन्द्वात्मक शब्द ऋग्वेद के नासदीय सूक्त से सूझ पड़े होंगे। तथापि दोनों में भेद है; नासदीय सूक्त में 'सत्' शब्द का उपयोग दृश्य सृष्टि के लिए किया गया है और गीता 'सत्' शब्द का उपयोग परब्रह्म के लिए करती है एवं दृश्य सृष्टि को असत् कहती है (देखो गीतार॰ पृ. 243 – 236)। किन्तु इस प्रकार परिभाषा का भेद हो तो भी 'सत्' और 'असत्' दोनों शब्दों की एक साथ योजना से प्रगट हो जाता है, कि इनमें दृश्य सृष्टि और परब्रह्म दोनों का एकत्र समावेश होता है। अतः यह भावार्थ भी निकाला जा सकेगा, कि परिभाषा के भेद से किसी को भी 'सत्' और 'असत्' कहा जाएँ, किन्तु यह दिखलाने के लिए कि दोनों परमेश्वर के ही रूप हैं, भगवान ने 'सत्' और 'असत्' मैं ही हूँ (देखो गी॰ 11.37 और 13.12)। इस प्रकार यद्यपि परमेश्वर के रूप अनेक है, तथापि अब बतलाते है, कि उनकी एकत्व से उपासना करने और अनेकत्व से उपासना करने में भेद है।
— Lokmanya Tilak