भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ९.१६ ·

English

मूल श्लोक

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम् ।मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

ahaṃ kraturahaṃ yajñaḥ svadhā'hamahamauṣadham mantro'hamahamevājyamahamagnirahaṃ hutam

९.१६अध्याय ९ · राजविद्याराजगुह्ययोग३४ में से श्लोक १६

अनुवाद

ऋतु अर्थात् श्रौत यज्ञ मैं हूँ, यज्ञ अर्थात् स्मार्तयज्ञ मैं हूँ, स्वधा अर्थात् श्राद्ध से पितरों को अर्पण किया हुआ अन्न मैं हूँ, औषध अर्थात् वनस्पति से (यज्ञ के अर्थ) उत्पन्न हुआ अन्न मैं हूँ, (यज्ञ में हवन करते समय पढ़े जाने वाले) मन्त्र मैं हूँ, घृत, अग्नि (अग्नि में छोड़ी हुई) आहुति मैं ही हूँ।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

मूल में ऋतु और यज्ञ दोनों शब्द समानार्थक ही हैं। परन्तु जिस प्रकार 'यज्ञ' शब्द का अर्थ व्यापक हो गया और देवपूजा, वैश्वदेव, अतिथिसत्कार, प्राणायाम एवं जप इत्यादि कर्मों को भी 'यज्ञ' कहने लगे (गी॰ 4.23 – 40), उस प्रकार 'ऋतु' शब्द का अर्थ बढ़ने नहीं पाया। श्रौतधर्म में अश्वमेध आदि जिन यज्ञों के लिए यह शब्द प्रयुक्त हुआ है, उसका वही अर्थ आगे भी स्थिर रहा है। अतएव शांकरभाष्य में कहा है, कि इस स्थल पर 'ऋतु' शब्द से 'श्रौत' यज्ञ और 'यज्ञ' शब्द से 'स्मार्त' यज्ञ समझना चाहिए; और ऊपर हमने यही अर्थ किया है। क्योंकि ऐसा न करें तो 'ऋतु' और 'यज्ञ' शब्द समानार्थक होकर इस श्लोक में उनकी अकारण द्विरुक्ति करने का दोष लगता है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ९, श्लोक ९.१६