मूल श्लोक
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
jñānayajñena cāpyanye yajanto māmupāsate ekatvena pṛthaktvena bahudhā viśvatomukham
अनुवाद
ऐसे ही और कुछ लोग एकत्व से अर्थात् अभेदवाद से, पृथक्त्व से अर्थात् भेदभाव से, या अनेक भाँति के ज्ञान-यज्ञ से यजन कर मेरी - जो सर्वतोमुख हूँ – उपासना किया करते हैं।
टिप्पणी
संसार में पाए जाने वाले दैवी और राक्षसी स्वभावों के पुरुषों का यहाँ जो संक्षिप्त वर्णन है, उसका विस्तार आगे सोलहवें अध्याय में किया गया है। पहले बतला ही आए है, कि ज्ञान-यज्ञ का अर्थ 'परमेश्वर का स्वरूप का ज्ञान से ही आकलन करके उसके द्वारा सिद्धि प्राप्त कर लेना' है (गी॰ 4.33 के टिप्पणी देखो) किन्तु परमेश्वर का यह ज्ञान भी द्वैत-अद्वैत आदि भेदों से अनेक प्रकार का हो सकता है, इस कारण ज्ञान-यज्ञ भी भिन्न-भिन्न प्रकार से हो सकते है। इस प्रकार यद्यपि ज्ञान-यज्ञ अनेक हो, तो भी पन्द्रहवें श्लोक का तात्पर्य यह है, कि परमेश्वर के विश्वतोमुख होने के कारण, ये सब यज्ञ उसे ही पहुँचते है। 'एकत्व,' 'पृथक्त्व' आदि पदों से प्रगट है, कि द्वैत-अद्वैत, विशिष्टद्वैत आदि सम्प्रदाय यद्यपि अर्वाचीन है, तथापि ये कल्पनाएँ प्राचीन है। इस श्लोक में परमेश्वर का एकत्व और पृथक्त्व बतलाया गया है, अब उसी का अधिक निरूपण कर बतलाते है कि पृथक्त्व में क्या है –
— Lokmanya Tilak