मूल श्लोक
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yaṃ yaṃ vāpi smaranbhāvaṃ tyajatyante kalevaram taṃ tamevaiti kaunteya sadā tadbhāvabhāvitaḥ
अनुवाद
अथवा हे कौन्तेय! सदा जन्मभर उसी में रँगे रहने से मनुष्य जिस भाव का स्मरण करता हुआ अन्त में शरीर त्यागता है, वह उसी भाव में जा मिलता है।
टिप्पणी
पाँचवें श्लोक में, मरण-समय में परमेश्वर के स्मरण करने की आवश्यकता और फल बतलाया है। सम्भव है, इसमें कोई यह समझ ले, कि केवल मरणकाल में यह स्मरण करने से ही काम चल जाता है। इसी हेतु से छठे श्लोक में यह बतलाया है, कि जो बात जन्मभर मन में रहती है वह मरणकाल में भी नहीं छूटती, अतएव न केवल मरणकाल में प्रत्युत जन्मभर परमेश्वर का स्मरण और उपासना करने की आवश्यकता है (गीतार॰ पृ. 288)। इस सिद्धान्त को मान लेने से आप ही आप सिद्ध हो जाता है, कि अन्तकाल में परमेश्वर को भजने वाले परमेश्वर को पाते हैं और देवताओं का स्मरण करनेवाले देवताओं को पाते है (गी॰ 7.23; 8.13 और 9.25) क्योंकि छान्दोग्य उपनिषद के कथनानुसार 'यथा क्रतरस्मिँ ल्लोक पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति' (छां॰ 3.14.1) – इसी श्लोक में मनुष्य का जैसा क्रतु अर्थात् संकल्प होता है, मरने पर उसे वैसी ही गति मिलती है। छान्दोग्य के समान और उपनिषदों में भी ऐसे ही वाक्य है (प्र॰ 3.10; मैत्र्यु॰ 4.6)। परन्तु गीता अब यह कहती है, कि जन्मभर एक ही भावना से मन को रँगे बिना अन्तकाल की यातना के समय वही भावना स्थिर नहीं रह सकती। अतएव आमरणान्त, जिन्दगी भर परमेश्वर का ध्यान करना आवश्यक है (वे॰ सू॰ 4.1.12) – इस सिद्धान्त के अनुसार अर्जुन से भगवान कहते हैं, कि –
— Lokmanya Tilak