मूल श्लोक
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
dhūmo rātristathā kṛṣṇaḥ ṣaṇmāsā dakṣiṇāyanam tatra cāndramasaṃ jyotiryogī prāpya nivartate
अनुवाद
(अग्नि ,) धुआँ, रात्रि, कृष्णपक्ष (और) दक्षिणायन के छः महीनों में मरा हुआ (कर्म-) योगी चन्द्र के तेज में अर्थात् लोक में जा कर (पुण्यांश घटने पर) लौट आता है।