मूल श्लोक
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
agnirjyotirahaḥ śuklaḥ ṣaṇmāsā uttarāyaṇam tatra prayātā gacchanti brahma brahmavido janāḥ
अनुवाद
अग्नि , ज्योति अर्थात् ज्वाला, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण के छः महीनों में मरे हुए ब्रह्मवेत्ता लोग ब्रह्म को पाते हैं (लौट कर नहीं आते)।