भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ८.२६ ·

English

मूल श्लोक

शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽऽवर्तते पुनः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

śuklakṛṣṇe gatī hyete jagataḥ śāśvate mate ekayā yātyanāvṛttimanyayā''vartate punaḥ

८.२६अध्याय ८ · अक्षरब्रह्मयोग२८ में से श्लोक २६

अनुवाद

इस प्रकार जगत की शुक्ल और कृष्ण अर्थात् (प्रकाशमय और अन्धकारमय दो शाश्वत गतियाँ यानी स्थिर मार्ग है। एक मार्ग से जाने पर लौटना नहीं पड़ता और दूसरे से फिर लौटना पड़ता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

उपनिषदों में इन दोनों गतियों को देवयान (शुक्ल) और पितृयाण (कृष्ण), अथवा अर्चिरादि मार्ग और धूम्र आदि मार्ग कहा है, तथा ऋग्वेद में भी इन मार्गों का उल्लेख है। मरे हुए मनुष्य की देह को अग्नि में जला देने पर, अग्नि से ही इन मार्गों का आरम्भ हो जाता है, अतएव पच्चीसवें श्लोक में 'अग्नि ' पद का पहले श्लोक से अध्याहार कर लेना चाहिए। पच्चीसवें श्लोक का हेतु यही बतलाना है, कि प्रथम श्लोकों में वर्णित मार्ग में और दूसरे मार्ग में कहाँ भेद होता है; इसी से 'अग्नि ' शब्द की पुनरावृत्ति इसमें नहीं की गई। गीतारहस्य के दसवें प्रकरण के अन्त (पृ. 295 – 298) में इस सम्बन्ध की अधिक बातें है, उनसे उल्लिखित श्लोक का भावार्थ खुल जाएगा। अब बतलाते है कि इन दोनों मार्गों का तत्त्व ज्ञान लेने से क्या फल मिलता है

— Lokmanya Tilak

अध्याय ८, श्लोक ८.२६