मूल श्लोक
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
ābrahmabhuvanāllokāḥ punarāvartino'rjuna māmupetya tu kaunteya punarjanma na vidyate
अनुवाद
हे अर्जुन! ब्रह्मलोक तक (स्वर्ग आदि) जितने लोक है वहाँ से (कभी न कभी इस लोक में) पुनरावर्तन अर्थात् लौटना (पड़ता) है। परन्तु हे कौन्तेय! मुझ में मिल जाने से पुनर्जन्म नहीं होता।
टिप्पणी
सोलहवें श्लोक के 'पुनरावर्तन' शब्द का अर्थ पुण्य चुक जाने पर भूलोक में लौट आना है (देखो गी॰ 9.21; मभा॰ वन॰ 260। यज्ञ देवताराधन और वेदाध्ययन प्रभृति कर्मों से यद्यपि इन्द्रलोक, वरुणलोक, सूर्यलोक और हुआ तो ब्रह्मलोक प्राप्त हो जावे, तथापि पुण्यांश के समाप्त होते ही वहाँ से फिर इस लोक में जन्म लेना पड़ता है (बृ॰ 4.4.6), अथवा अन्ततः ब्रह्मलोक का नाश हो जाने पर पुनर्जन्म-चक्र में तो जरूर ही गिरना पड़ता है। अतएव उक्त श्लोक का भावार्थ यह है, कि ऊपर लिखी हुई सब गतियाँ कम दर्जे की हैं, और परमेश्वर के ज्ञान से ही पुनर्जन्म नष्ट होता है, इस कारण वही गति सर्वश्रेष्ठ है (गी॰ 9.20, 21)। अन्त में जो यह कहा है, कि ब्रह्मलोक की प्राप्ति भी अनित्य है, उसके समर्थन में बतलाते है कि ब्रह्मलोक तक समस्त सृष्टि की उत्पत्ति और लय बारंबार कैसे होता रहता है –
— Lokmanya Tilak