मूल श्लोक
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sahasrayugaparyantamaharyadbrahmaṇo viduḥ rātriṃ yugasahasrāntāṃ te'horātravido janāḥ
अनुवाद
अहोरात्र को (तत्त्वतः) जानने वाले पुरुष समझते है, कि (कृत, त्रेता, द्वापर और कलि इन चारों युगों का एक महायुग होता है और ऐसे) हजार (महा-) युगों का समय ब्रह्मदेव का एक दिन है, और (ऐसे ही) हजार युगों की (उसकी) एक रात्रि है।
टिप्पणी
यह श्लोक इससे पहले के युगमान का हिसाब न देकर गीता में आधा है; इसका अर्थ अन्यत्र बतलाए हुए हिसाब से करना चाहिए। यह हिसाब और गीता का यह श्लोक भी भारत (शां॰ 231.31) और मनुस्मृति (1.73) में है, तथा यास्क के निरुक्त में भी यही अर्थ वर्णित है (निरुक्त॰ 14.9)। ब्रह्मदेव के दिन को ही कल्प कहते है। अगले श्लोक में अव्यक्त का अर्थ सांख्यशास्त्र की अव्यक्त प्रकृति है। अव्यक्त का अर्थ परब्रह्म नहीं है; क्योंकि 20 वें श्लोक में स्पष्ट बतला दिया है, कि ब्रह्मरूपी अव्यक्त 18 वें श्लोक में वर्णित अव्यक्त से परे का और भिन्न है। गीतारहस्य के आठवें प्रकरण ( पृ. 193 में इसका पूरा खुलासा है, कि अव्यक्त से व्यक्त की सृष्टि कैसे होती है और कल्प के काल-मान का हिसाब भी वहीं लिखा है।
— Lokmanya Tilak