मूल श्लोक
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
ananyacetāḥ satataṃ yo māṃ smarati nityaśaḥ tasyāhaṃ sulabhaḥ pārtha nityayuktasya yoginaḥ
अनुवाद
हे पार्थ! अनन्य भाव से सदा-सर्वदा जो मेरा नित्य स्मरण करता रहता है, उस नित्ययुक्त (कर्म-)योगी को मेरी प्राप्ति सुलभ रीति से होती है।