मूल श्लोक
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
omityekākṣaraṃ brahma vyāharanmāmanusmaran yaḥ prayāti tyajandehaṃ sa yāti paramāṃ gatim
अनुवाद
इस एकाक्षर ब्रह्म ॐ का जप और मेरा स्मरण करता हुआ जो (मनुष्य) देह छोड़ कर जाता है, उसे उत्तम गति मिलती है।
टिप्पणी
श्लोक 9 – 11 में परमेश्वर के स्वरूप का जो वर्णन है, वह उपनिषदों से लिया गया है। नवें श्लोक का 'अणोरणीयान्' पद और अन्त का चरण श्वेताश्वतर उपनिषद का है (श्वे॰ 3.8 और 9), एवं ग्यारहवें श्लोक का पूर्वार्ध अर्थतः और उत्तरार्ध शब्दशः कठ उपनिषद का है (कठ॰ 15)। कठ उपनिषद में 'तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि' इस चरण के आगे 'ओमित्येतत्' स्पष्ट कहा गया है; इससे प्रगट होता है, कि 11 वे श्लोक के 'अक्षर' और 'पद' शब्दों का अर्थ ॐवर्णाक्षर-रूपी ब्रह्म अथवा ॐ शब्द लेना चाहिए; और 13 वें श्लोक से भी प्रगट होता है, कि यहाँ ॐकारोपासना ही उद्दिष्ट है (देखो प्रश्न 5)। तथापि यह नहीं कह सकते, कि भगवान के मन में 'अक्षर' = अविनाशी ब्रह्म, और 'पद' = परम स्थान, ये अर्थ भी न होगे। क्योंकि ॐ वर्णमाला का एक अक्षर है; इसके सिवा यह कहा जा सकेगा, कि वह ब्रह्म के प्रतीक के नाते अविनाशी भी है (21 वाँ श्लोक देखो), इसलिए 11 वें श्लोक के अनुवाद में 'अक्षर' और 'पद' ये दुहरे अर्थ वाले मूल शब्द ही हमने रख लिए है। अब इस उपासना से मिलने वाली उत्तम गति का अधिक निरूपण करते हैं –
— Lokmanya Tilak