मूल श्लोक
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sarvadvārāṇi saṃyamya mano hṛdi nirudhya ca mūrdhnyādhāyātmanaḥ prāṇamāsthito yogadhāraṇām
अनुवाद
सब (इन्द्रियरूपी) द्वारों का संयम कर और मन का हृदय में निरोध करके (एवं) मस्तक में प्राण ले जा कर समाधियोग में स्थित होनेवाला,