मूल श्लोक
प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
prayāṇakāle manasā'calena bhaktyā yukto yogabalena caiva bhruvormadhye prāṇamāveśya samyak sa taṃ paraṃ puruṣamupaiti divyam
अनुवाद
(8.9–10) जो (मनुष्य) अन्तकाल में (इन्द्रियनिग्रहरूप) योग के सामर्थ्य से भक्तियुक्त होकर मन को स्थिर करके दोनों भौंहों के बीच में प्राण को भली भाँति रख कर, कवि अर्थात् सर्वज्ञ, पुरातन, शास्ता, अणु से भी छोटे, सब के धाता अर्थात् आधार या कर्त्ता, अचिन्त्यस्वरूप और अन्धकार से परे, सूर्य के समान देदीप्यमान पुरुष का स्मरण करता है, वह (मनुष्य) उसी दिव्य परम पुरुष में जा मिलता है।