मूल श्लोक
कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
kaviṃ purāṇamanuśāsitāramaṇoraṇīyāṃsamanusmaredyaḥ sarvasya dhātāramacintyarūpamādityavarṇaṃ tamasaḥ parastāt
अनुवाद
(8.9–10) जो (मनुष्य) अन्तकाल में (इन्द्रियनिग्रहरूप) योग के सामर्थ्य से भक्तियुक्त होकर मन को स्थिर करके दोनों भौंहों के बीच में प्राण को भली भाँति रख कर, कवि अर्थात् सर्वज्ञ, पुरातन, शास्ता, अणु से भी छोटे, सब के धाता अर्थात् आधार या कर्त्ता, अचिन्त्यस्वरूप और अन्धकार से परे, सूर्य के समान देदीप्यमान पुरुष का स्मरण करता है, वह (मनुष्य) उसी दिव्य परम पुरुष में जा मिलता है।