मूल श्लोक
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
manuṣyāṇāṃ sahasreṣu kaścidyatati siddhaye yatatāmapi siddhānāṃ kaścinmāṃ vetti tattvataḥ
अनुवाद
हजारों मनुष्यों में कोई एक-आध ही सिद्धि पाने का यत्न करता है, और प्रयत्न करनेवाले इन (अनेक) सिद्धि पुरुषों में से एक-आध को ही मेरी सच्चा ज्ञान हो जाता है।
टिप्पणी
ध्यान रहे, कि यहाँ प्रयत्न करने वालों को यद्यपि सिद्ध पुरुष कह दिया है, तथापि परमेश्वर का ज्ञान हो जाने पर ही उन्हें सिद्धि प्राप्त होती है, अन्यथा नहीं। परमेश्वर के ज्ञान के क्षर-अक्षर-विचार और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार ये दो भाग है। इनमें से अब क्षर-अक्षर-विचार का आरम्भ करते हैं –
— Lokmanya Tilak