भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ७.३ ·

English

मूल श्लोक

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

manuṣyāṇāṃ sahasreṣu kaścidyatati siddhaye yatatāmapi siddhānāṃ kaścinmāṃ vetti tattvataḥ

७.३अध्याय ७ · ज्ञानयोग३० में से श्लोक ३

अनुवाद

हजारों मनुष्यों में कोई एक-आध ही सिद्धि पाने का यत्न करता है, और प्रयत्न करनेवाले इन (अनेक) सिद्धि पुरुषों में से एक-आध को ही मेरी सच्चा ज्ञान हो जाता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

ध्यान रहे, कि यहाँ प्रयत्न करने वालों को यद्यपि सिद्ध पुरुष कह दिया है, तथापि परमेश्वर का ज्ञान हो जाने पर ही उन्हें सिद्धि प्राप्त होती है, अन्यथा नहीं। परमेश्वर के ज्ञान के क्षर-अक्षर-विचार और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार ये दो भाग है। इनमें से अब क्षर-अक्षर-विचार का आरम्भ करते हैं –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ७, श्लोक ७.३