भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ७.२ ·

English

मूल श्लोक

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

jñānaṃ te'haṃ savijñānamidaṃ vakṣyāmyaśeṣataḥ yajjñātvā neha bhūyo'nyajjñātavyamavaśiṣyate

७.२अध्याय ७ · ज्ञानयोग३० में से श्लोक २

अनुवाद

विज्ञानसमेत इस पूरे ज्ञान को मैं तुझ से कहता हूँ, कि जिसके जान लेने से इस लोक में फिर और कुछ भी जानने के लिए नहीं रह जाता।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

पहले श्लोक के 'मेरा ही आश्रय करके' इन शब्दों से और विशेष कर 'योग' शब्द से प्रगट होता है, कि पहले के अध्यायों में वर्णित कर्मयोग की सिद्धि के लिए ही अगला ज्ञान-विज्ञान कहा है – स्वतन्त्र रूप से नहीं बतलाया है (देखो गीतार॰ पृ. 454 – 455)। न केवल इसी श्लोक में प्रत्युत गीता में अन्यत्र भी कर्मयोग को लक्षय कर ये शब्द आए हैं 'मद्योगमाश्रितः' (गी॰ 12.11), 'मत्परः' (गी॰ 18.57 और 11.55); अतः इस विषय में कोई शंका नहीं रहती, कि परमेश्वर का आश्रय करके जिस योग का आचरण करने के लिए गीता कहती है, वह पीछे के छः अध्यायों में प्रतिपादित कर्मयोग ही है। कुछ लोग विज्ञान का अर्थ अनुभविक ब्रह्मज्ञान अथवा ब्रह्म का साक्षात्कार कहते है, परन्तु ऊपर के कथनानुसार हमें ज्ञात होता है कि परमेश्वरी ज्ञान के ही समष्टि रूप (ज्ञान) और व्यष्टिरूप (विज्ञान) ये दो भेद है, इस कारण ज्ञान-विज्ञान शब्द से भी उन्हीं का अभिप्राय है (गी॰ 13.30 और 18.20 देखो)। दूसरे श्लोक के शब्द 'फिर और कुछ भी जानने के लिए नहीं रह जाता' उपनिषद् के आधार से लिए गए हैं। छान्दोग्य उपनिषद् में श्वेतकेतु से उनके बाप ने यह प्रश्न किया है कि 'येन... अविज्ञातं विज्ञातं भवति' – वह क्या है, कि जिस एक के जान लेने से सब कुछ जान लिया जाता है? और फिर आग उसका इस प्रकार खुलासा किया है 'यथा सौम्यैकन मृत्पिण्डेन सर्वं मृण्मयं विज्ञातं स्याद्वाचरम्भर्णं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्' (छां॰ 6.1.4) – हे तात! जिस प्रकार मिट्टी के एक गोले के भीतरी भेद को जान लेने से ज्ञात हो जाता है, कि शेष मिट्टी के पदार्य़ उसी मृत्तिका के विभिन्न नाम-रूप धारण करनेवाले विकार है, और कुछ नहीं हैं, उसी प्रकार ब्रह्म को जान लेने से दूसरा कुछ भी जानने के लिए नहीं रहता। मुण्डक उपनिषद (1.1.3) में भी आरम्भ में ही यह प्रश्न है, कि 'कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति' – किसका ज्ञान हो जाने से अन्य सब वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है? इससे व्यक्त होता है, कि अद्वैत वेदान्त का यही तत्त्व यहाँ अभिप्रेत है, कि एक परमेश्वर का ज्ञान-विज्ञान हो जाने से इस जगत में और कुछ भी जानने के लिए रह नहीं जाता; क्योंकि जगत का मूल तत्त्व तो एक ही है, नाम और रूप के भेद से वही सर्वत्र समाया हुआ है, सिवा उसके और कोई दूसरी वस्तु दुनिया में है ही नहीं। यदि ऐसा न हो तो दूसरे श्लोक की प्रतिज्ञा सार्थक नहीं होती।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ७, श्लोक ७.२