मूल श्लोक
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
icchādveṣasamutthena dvandvamohena bhārata sarvabhūtāni sammohaṃ sarge yānti parantapa
अनुवाद
क्योंकि हे भारत! (इन्द्रियों के) इच्छा और द्वेष से उपजने वाले (सुख-दुःख आदि) द्वन्द्वों के मोह से इस सृष्टि में समस्त प्राणी, हे परन्तप! भ्रम में फँस जाते है।