मूल श्लोक
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
caturvidhā bhajante māṃ janāḥ sukṛtino'rjuna ārto jijñāsurarthārthī jñānī ca bharatarṣabha
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! चार प्रकार के पुण्यात्मा लोग मेरी भक्ति किया करते है:– 1 – आर्त अर्थात् रोग से पीड़ित, 2 – जिज्ञासु अर्थात् ज्ञान प्राप्त कर लेने की इच्छा रखने वाले, 3 – अर्थार्थी अर्थात् द्रव्य आदि काम्य वासनाओं को मन में रखने वाले और 4 – ज्ञानी अर्थात् परमेश्वर का ज्ञान पा कर कृतार्थ हो जाने से आगे कुछ न प्राप्त न करना हो, तो भी निष्काम बुद्धि से भक्ति करनेवाले।