मूल श्लोक
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
teṣāṃ jñānī nityayukta ekabhaktirviśiṣyate priyo hi jñānino'tyarthamahaṃ sa ca mama priyaḥ
अनुवाद
इनमें एक भक्ति अर्थात् अनन्यभाव से मेरी भक्ति करनेवाले और सदैव युक्त यानी निष्काम बुद्धि से बर्तने वाले ज्ञानी की योग्यता विशेष है। ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और ज्ञानी मुझ (अत्यन्त) प्रिय है।