मूल श्लोक
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
daivī hyeṣā guṇamayī mama māyā duratyayā māmeva ye prapadyante māyāmetāṃ taranti te
अनुवाद
मेरी यह गुणात्मक और दिव्य माया दुस्तर है। अतः इस माया को वे पार कर जाते है, जो मेरी ही शरण में आते है।
टिप्पणी
इससे प्रगट होता है, कि सांख्यशास्त्र की त्रिगुणात्मक प्रकृति को ही गीता में भगवान अपना माया कहते है। महाभारत के नारायणी-उपाख्यान में कहा है, कि नारद को विश्वरूप दिखला कर अन्त में भगवान बोले कि – माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद। सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैव त्वं ज्ञातुमर्हसि॥ 'हे नारद! तुम जिसे देख रहे हो, यह मेरी उत्पन्न की हुई माया है। तुम मुझे सब प्राणियों के गुणों से युक्त मत समझो' (शां॰ 339.44)। वही सिद्धान्त अब यहाँ भी बतलाया गया है। गीतारहस्य के 9 वें और 10 वें प्रकरण में बतला दिया है, कि माया क्या चीज है।
— Lokmanya Tilak