भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ७.१३ ·

English

मूल श्लोक

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

tribhirguṇamayairbhāvairebhiḥ sarvamidaṃ jagat mohitaṃ nābhijānāti māmebhyaḥ paramavyayam

७.१३अध्याय ७ · ज्ञानयोग३० में से श्लोक १३

अनुवाद

(सत्त्व, रज और तम) इन तीनों गुणात्मक भावों से अर्थात् पदार्थों से मोहित होकर यह सारा संसार, इनसे परे के (अर्थात् निर्गुण) मुझ अव्यय (परमेश्वर) को नहीं जानता।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

माया के सम्बन्ध में गीतारहस्य के 9 वें प्रकरण में यह सिद्धान्त है, कि माया अथवा अज्ञान त्रिगुणात्मक देहेन्द्रिय का धर्म है, न कि आत्मा का; आत्मा तो ज्ञानमय और नित्य है, इन्द्रियाँ उसको भ्रम में डालती हैं – उसी अद्वैती सिद्धान्त को ऊपर के श्लोक में कहा है। देखो. गी॰ 6.24 और गीतार॰ पृ. 236 – 247

— Lokmanya Tilak

अध्याय ७, श्लोक ७.१३