भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ७.१२ ·

English

मूल श्लोक

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

ye caiva sāttvikā bhāvā rājasāstāmasāśca ye matta eveti tānviddhi na tvahaṃ teṣu te mayi

७.१२अध्याय ७ · ज्ञानयोग३० में से श्लोक १२

अनुवाद

और यह समझ कि जो कुछ सात्त्विक, राजस या तामस भाव अर्थात् पदार्थ हैं वे सब मुझ से ही हुए है, परन्तु वे मुझ में हैं; मैं उनमें नहीं हूँ।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

'वे मुझ में है, मैं उनमें नहीं हूँ' इसका अर्थ बड़ा ही गम्भीर है। पहला प्रगट अर्थ यह है कि सभी परमेश्वर से उत्पन्न हुए है। इसलिए मणियों में धागे के समान इन पदार्थों का गुण-धर्म भी यद्यपि परमेश्वर ही है, तथापि परमेश्वर की व्याप्ति इसी में नहीं चुक जाती, समझना चाहिए कि इनको व्याप्त कर इनके परे भी यही परमेश्वर है, और यही अर्थ आगे 'इस समस्त जगत को मैं एकांश से व्याप्त कर रहा हूँ' (गी॰ 10.42) इस श्लोक में वर्णित है। परन्तु इसके अतिरिक्त दूसरा भी अर्थ सदैव विवक्षित रहता है। वह यह है, कि त्रिगुणात्मक जगत का नानात्व यद्यपि मुझ से निर्गुण हुआ देख पड़ता है, तथापि वह नानात्व मेरे निर्गुण स्वरूप में नहीं रहता और इस दूसरे अर्थ को मन में रख कर 'भूतभृत् न च भूतस्थः'(9.4 और 5) इत्यादि परमेश्वर की अलौकि क शक्तियों के वर्णन किए गए है (गी॰ 13.14 – 16)। इस प्रकार यदि परमेश्वर की व्याप्ति समस्त जगत से भी अधिक है, तो प्रगट है कि परमेश्वर के सच्चे स्वरूप को पहचानने के लिए इस मायिक जगत से भी परे जाना चाहिए, और अब उसी अर्थ को स्पष्टतया प्रतिपादन करते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ७, श्लोक ७.१२