भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ६.९ ·

English

मूल श्लोक

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

suhṛnmitrāryudāsīnamadhyasthadveṣyabandhuṣu sādhuṣvapi ca pāpeṣu samabuddhirviśiṣyate

६.९अध्याय ६ · अध्यात्मयोग४७ में से श्लोक ९

अनुवाद

सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष करने योग्य, बान्धव, साधु और दुष्ट लोगों के विषय में भी जिसकी बुद्धि सम हो गई हो, वही (पुरुष) विशेष योग्यता का है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

प्रत्युपकार की इच्छा न रखकर सहायता करनेवाले स्नेही को सुहृद् कहते है; जब दो दल हो जाएँ तब किसी की भी बुराई-भलाई न चाहने वाले को उदासीन कहते है; दोनों दलों की भलाई चाहने वाले को मध्यस्थ कहते है और सम्बन्धी को बन्धु कहते है। टीकाकारों ने ऐसे ही अर्थ किए हैं। परन्तु इन अर्थों से कुछ भिन्न अर्थ भी कर सकते हैं। क्योंकि इन शब्दों का प्रयोग प्रत्येक में कुछ भिन्न अर्थ दिखलाने के लिए ही नहीं किया गया है, किन्तु अनेक शब्दों की यह योजना सिर्फ इसलिए की गई है, कि सब के मेल से व्यापक अर्थ का बोध हो जाएँ – उसमें कुछ भी न्यूनता न रहने पावे। इस प्रकार संक्षेप से बतला दिया कि योगी, योगारूढ या युक्त किसे कहना चाहिए (गी॰ 2.61; 4.18 और 5.23 देखो)। और यह भी बतला दिया, कि इस कर्मयोग को सिद्ध कर लेने के लिए प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्र है; उसके लिए किसी का मुँह जोहने की कोई जरूरत नहीं। अब कर्मयोग की सिद्धि के लिए अपेक्षित साधन का निरूपण करते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ६, श्लोक ६.९