भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ६.१० ·

English

मूल श्लोक

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yogī yuñjīta satatamātmānaṃ rahasi sthitaḥ ekākī yatacittātmā nirāśīraparigrahaḥ

६.१०अध्याय ६ · अध्यात्मयोग४७ में से श्लोक १०

अनुवाद

योगी अर्थात् कर्मयोगी एकान्त में अकेला रह कर चित्त और आत्मा का संयम करें, किसी भी काम्य वासना को न रख कर, परिग्रह अर्थात् पाश छोड़ करके निरन्तर अपने योगाभ्यास में लगा रहे।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

अगले श्लोक से स्पष्ट होता है, कि यहाँ पर 'युञ्जीत' पद से पातंजल सूत्र का योग विवक्षित है। तथापि इसका यह अर्थ नहीं है, कि कर्मयोग को प्राप्त कर लेने की इच्छा करनेवाला पुरुष अपनी समस्त आयु पातंजल-योग में बिता दे। कर्मयोग के लिए आवश्यक साम्यबुद्धि को प्राप्त करने के लिए साधनस्वरूप पातंजल-योग इस अध्याय में वर्णित है, और इतने ही के लिए एकान्तवास भी आवश्यक है। प्रकृति-स्वभाव के कारण सम्भव नहीं कि सभी को पातंजल योग की समाधि एक ही जन्म में सिद्ध हो जाएँ। इसी अध्याय के अन्त में भगवान ने कहा है, कि जिन पुरुषों को समाधि सिद्ध नहीं हुई है, वे अपनी सारी आयु पातंजल योग में ही न बिता दें; किन्तु, जितना हो सके उतना, बुद्धि को स्थिर करके कर्मयोग का आचरण करते जावें, इसी से अनेक जन्मों में उनको अन्त में सिद्धि मिल जाएगी। गीतारहस्य पृ. 282 – 285 देखो।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ६, श्लोक ६.१०