मूल श्लोक
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yogī yuñjīta satatamātmānaṃ rahasi sthitaḥ ekākī yatacittātmā nirāśīraparigrahaḥ
अनुवाद
योगी अर्थात् कर्मयोगी एकान्त में अकेला रह कर चित्त और आत्मा का संयम करें, किसी भी काम्य वासना को न रख कर, परिग्रह अर्थात् पाश छोड़ करके निरन्तर अपने योगाभ्यास में लगा रहे।
टिप्पणी
अगले श्लोक से स्पष्ट होता है, कि यहाँ पर 'युञ्जीत' पद से पातंजल सूत्र का योग विवक्षित है। तथापि इसका यह अर्थ नहीं है, कि कर्मयोग को प्राप्त कर लेने की इच्छा करनेवाला पुरुष अपनी समस्त आयु पातंजल-योग में बिता दे। कर्मयोग के लिए आवश्यक साम्यबुद्धि को प्राप्त करने के लिए साधनस्वरूप पातंजल-योग इस अध्याय में वर्णित है, और इतने ही के लिए एकान्तवास भी आवश्यक है। प्रकृति-स्वभाव के कारण सम्भव नहीं कि सभी को पातंजल योग की समाधि एक ही जन्म में सिद्ध हो जाएँ। इसी अध्याय के अन्त में भगवान ने कहा है, कि जिन पुरुषों को समाधि सिद्ध नहीं हुई है, वे अपनी सारी आयु पातंजल योग में ही न बिता दें; किन्तु, जितना हो सके उतना, बुद्धि को स्थिर करके कर्मयोग का आचरण करते जावें, इसी से अनेक जन्मों में उनको अन्त में सिद्धि मिल जाएगी। गीतारहस्य पृ. 282 – 285 देखो।
— Lokmanya Tilak