भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ६.८ ·

English

मूल श्लोक

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

jñānavijñānatṛptātmā kūṭastho vijitendriyaḥ yukta ityucyate yogī samaloṣṭāśmakāñcanaḥ

६.८अध्याय ६ · अध्यात्मयोग४७ में से श्लोक ८

अनुवाद

जिसका आत्मा ज्ञान और विज्ञान अर्थात् विविध ज्ञान से तृप्त हो जाएँ, जो अपनी इन्द्रियों को जीत ले, जो कूटस्थ अर्थात् मूल में जा पहुँचे और मिट्टी पत्थर एवं सोने को एक-सा मानने लगे, उसी (कर्म-) योगी पुरुष को 'युक्त' अर्थात् सिद्धावस्था को पहुँचा हुआ कहते है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ६, श्लोक ६.८