मूल श्लोक
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ śītoṣṇasukhaduḥkheṣu tathā mānāpamānayoḥ
अनुवाद
जिसने अपने आत्मा अर्थात् अन्तःकरण को जीत लिया हो और जिसे शान्ति प्राप्त हो गई हो, उसका 'परमात्मा' शीत-उष्ण, सुख-दुःख और मान-अपमान में समाहित अर्थात् सम एवं स्थिर रहता है।
टिप्पणी
इस श्लोक में 'परमात्मा' शब्द आत्मा के लिए ही प्रयुक्त है। देह का आत्मा सामान्यतः सुख-दुःख की उपाधि में मग्न रहता है; परन्तु इन्द्रिय संयम से उपाधियों को जीत लेने पर यही आत्मा प्रसन्न हो करके परमात्मरूपी या परमेश्वर-स्वरूपी बना करता है। परमात्मा कुछ आत्मा से विभिन्न स्वरूप का पदार्थ नहीं है, आगे गीता में ही (गी॰ 13.22 और 31) कहा है, कि मानवी शरीर में रहनेवाला आत्मा ही तत्त्वतः परमात्मा है! महाभारत में यह वर्णन है –
— Lokmanya Tilak