भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ६.७ ·

English

मूल श्लोक

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ śītoṣṇasukhaduḥkheṣu tathā mānāpamānayoḥ

६.७अध्याय ६ · अध्यात्मयोग४७ में से श्लोक ७

अनुवाद

जिसने अपने आत्मा अर्थात् अन्तःकरण को जीत लिया हो और जिसे शान्ति प्राप्त हो गई हो, उसका 'परमात्मा' शीत-उष्ण, सुख-दुःख और मान-अपमान में समाहित अर्थात् सम एवं स्थिर रहता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस श्लोक में 'परमात्मा' शब्द आत्मा के लिए ही प्रयुक्त है। देह का आत्मा सामान्यतः सुख-दुःख की उपाधि में मग्न रहता है; परन्तु इन्द्रिय संयम से उपाधियों को जीत लेने पर यही आत्मा प्रसन्न हो करके परमात्मरूपी या परमेश्वर-स्वरूपी बना करता है। परमात्मा कुछ आत्मा से विभिन्न स्वरूप का पदार्थ नहीं है, आगे गीता में ही (गी॰ 13.22 और 31) कहा है, कि मानवी शरीर में रहनेवाला आत्मा ही तत्त्वतः परमात्मा है! महाभारत में यह वर्णन है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ६, श्लोक ६.७