मूल श्लोक
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśo'pi saḥ jijñāsurapi yogasya śabdabrahmātivartate
अनुवाद
अपने पूर्वजन्म के उस अभ्यास से ही अवश अर्थात् अपनी इच्छा न रहने पर भी, वह (पूर्ण सिद्धि की ओर) खींचा जाता है। जिसे (कर्म-) योग की जिज्ञासा, अर्थात् जान लेने की इच्छा हो गई है वह भी शब्दब्रह्म के परे चला जाता है।