भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ६.४५ ·

English

मूल श्लोक

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

prayatnādyatamānastu yogī saṃśuddhakilbiṣaḥ anekajanmasaṃsiddhastato yāti parāṃ gatim

६.४५अध्याय ६ · अध्यात्मयोग४७ में से श्लोक ४५

अनुवाद

(इस प्रकार) प्रयत्नपूर्वक उद्योग करते-करते पापों से शुद्ध होता हुआ (कर्म-) योगी अनेक जन्मों के अनन्तर सिद्धि पा कर अन्त में उत्तम गति पा लेता है!

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इन श्लोकों में योग, योगभ्रष्ट और योगी शब्द कर्मयोग, कर्मयोग से भ्रष्ट और कर्मयोगी के अर्थ में ही व्यवहृत है। क्योंकि श्रीमान् कुल में जन्म लेने की स्थिति दूसरों को इष्ट होना सम्भव ही नहीं। भगवान कहते है, कि पहले से, जितना हो सके उतना शुद्ध बुद्धि से कर्मयोग का आचरण करना आरम्भ करें। थोड़ा ही क्यों न हो, पर इस रीति से जो कर्म किया जावेगा वही इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में, इस प्रकार अधिक-अधिक सिद्धि मिलने के लिए उत्तरोत्तर कारणीभूत होगा और उसी से अन्त में पूरी सद्गति मिलती है। 'इस धर्म का थोड़ा सा भी आचरण किया जाए तो वह बड़े भय से रक्षा करता है' (गी, 2,49) और 'अनेक जन्मों के पश्चात वासुदेव की प्राप्ति होती है' (7.19), ये श्लोक उसी सिद्धान्त के पूरक है। अधिक विवेचन गीतारहस्य के पृ.282 – 285 में किया गया है। 44 वें श्लोक के शब्दब्रह्म का अर्थ है 'वैदिक यज्ञ-याग आदि अन्य कर्म।' क्योंकि ये कर्म वेदविहित है और वेदों पर श्रद्धा रखकर ही ये किए जाते है, तथा वेद अर्थात् सब सृष्टि से पहले पहल का शब्द यानी शब्दब्रह्म है। प्रत्येक मनुष्य पहले पहल सभी कर्म काम्यबुद्धि से किया करता है; परन्तु इस कर्म से जैसी-जैसी चित्तशुद्धि होती जाती है, वैसे ही वैसे आगे निष्काम बुद्धि से कर्म करने की इच्छा होती है। इसी से उपनिषदों में महाभारत में भी (मैत्र्यु॰ 6.22; अमृतबिन्दु॰ 17; मभा॰ शां॰ 231.63, 269.1) यह वर्णन है कि – द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत्। शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्मधिगच्छति॥ 'जानना चाहिए कि ब्रह्म दो प्रकार का है; एक ब्रह्म और दूसरा उससे परे का (निर्गुण)। शब्दब्रह्म में निष्णात हो जाने पर फिर इससे परे का (निर्गुण) ब्रह्म प्राप्त होता है।' शब्दब्रह्म के काम्य कर्मों से उकता कर अन्त में लोकसंग्रह के अर्थ इन्हीं कर्मों को कराने वाले कर्मयोग की इच्छा होती है और फिर तब इस निष्काम कर्मयोग का थोड़ा-थोड़ा आचरण होने लगता है। अनन्तर 'स्वल्पारम्भाः क्षेमकराः' के न्याय से ही थोड़ा-सा आचरण उस मनुष्य को इस मार्ग में धीरे-धीरे खींचता जाता है और अन्त में क्रम-क्रम से पूर्ण सिद्धि करा देता है। 44 वें श्लोक में जो यह कहा है कि 'कर्मयोग के जान लेने की इच्छा होने से भी वह शब्दब्रह्म के परे जाता है' उसका तात्पर्य भी यही है। क्योंकि यह जिज्ञासा कर्मयोगरूपी चरखे का मुँह है; और एक बार इस चरखे के मुँह में लग जाने पर फिर इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में, कभी न कभी, पूर्ण सिद्धि मिलती है और वह शब्दब्रह्म से परे के ब्रह्म तक पहुँचे बिना नहीं रहता। पहले पहल जान पड़ता है, यह सिद्धि जनक आदि को एक ही जन्म में मिल गई होगी; परन्तु तात्त्विक दृष्टि से देखने पर पता चलता है, कि उन्हें भी यह फल जन्म-जन्मान्तर के पूर्व संस्कार से ही मिला होगा। अस्तु; कर्मयोग का थोड़ा-सा आचरण, यहाँ तक कि जिज्ञासा भी सदैव कल्याणकारक है, इसके अतिरिक्त अन्त में मोक्ष-प्राप्ति भी निःसन्देह इसी से होती है; अतः अब भगवान अर्जुन से कहते है कि –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ६, श्लोक ६.४५