भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ६.३९ ·

English

मूल श्लोक

एतं मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता नह्युपपद्यते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

etaṃ me saṃśayaṃ kṛṣṇa chettumarhasyaśeṣataḥ tvadanyaḥ saṃśayasyāsya chettā nahyupapadyate

६.३९अध्याय ६ · अध्यात्मयोग४७ में से श्लोक ३९

अनुवाद

हे कृष्ण! मेरे इस सन्देह को तुम्हें ही निःशेष दूर करना चाहिए; तुम्हें छोड़कर इस सन्देह को मिटाने वाला दूसरा कोई न मिलेगा।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

यद्यपि नञ् समास में आरम्भ में नञ् (अ) पद का साधारण 'अभाव' होता है, तथापि कई बार 'अल्प' अर्थ में भी उसका प्रयोग हुआ करता है, इस कारण 37 वें श्लोक के 'अयति' शब्द का अर्थ 'अल्प अर्थात् अधूरा प्रयत्न या संयम करनेवाला' हैं। 39 वें श्लोक में जो कहा है, कि 'दोनों ओर का आश्रय छूटा हुआ' अथवा 'इतो भ्रष्टस्ततो भ्रष्टः' उस का अर्थ भी कर्मयोग-प्रधान ही करना चाहिए। कर्म को दो प्रकार के फल है (1) साम्यबुद्धि से किन्तु शास्त्र की आज्ञा के अनुसार कर्म करने पर तो स्वर्ग की प्राप्ति होती है, और (निष्काम) बुद्धि से कहने पर वह बन्धक न होकर मोक्षदायक हो जाता है। परन्तु इस अधूरे मनुष्य को कर्म के स्वर्ग आदि काम्य फल नहीं मिलते, क्योंकि उसका ऐसा हेतु ही नहीं सहता; और साम्यबुद्धि पूर्ण न होने के कारण और मोक्ष मिल नहीं सकता, इसलिए अर्जुन के मन में यह शंका उत्पन्न हुई, कि उस बेचारे को न तो स्वर्ग मिला और न मोक्ष – कहीं उसकी ऐसी स्थिति तो नहीं हो जाती कि दोनों दीन से गए पाँडे, हलुवा मिले ना माँडे? यह शंका केवल पातंजल-योगरूपी कर्मयोग के साधन के लिए ही नहीं की जाती। अगले अध्याय में वर्णन है, कि कर्मयोगसिद्धि के लिए आवश्यक साम्यबुद्धि कभी पातंजल-योग से, कभी भक्ति से और कभी ज्ञान से प्राप्त होती है; और जिस प्रकार पातंजल-योगरूपी यह साधन एक ही जन्म में अधूरा रह सकता है, उसी प्रकार भक्ति या ज्ञानरूपी साधन भी एक जन्म में अपूर्ण रह सकते हैं। अतएव कहना चाहिए, कि अर्जुन के उक्त प्रश्न का भगवान ने जो उत्तर दिया है, वह कर्मयोगमार्ग के सभी साधनों को साधारण रीति से उपयुक्त हो सकता है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ६, श्लोक ६.३९