मूल श्लोक
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
kaccinnobhayavibhraṣṭaśchinnābhramiva naśyati apratiṣṭho mahābāho vimūḍho brahmaṇaḥ pathi
अनुवाद
हे महाबाहु श्रीकृष्ण! यह पुरुष मोहग्रस्त होकर ब्रह्म-प्राप्ति के मार्ग में स्थिर न होने के कारण दोनों ओर से भ्रष्ट हो जाने पर छिन्न-छिन्न बादल के समान (बीच में ही) नष्ट तो नहीं हो जाता?